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अरोमा थेरपी: दवा न भायी तो खुशबू रंग लायी

अरोमा थेरपी: दवा न भायी तो खुशबू रंग लायी
अरोमा थेरपी: दवा न भायी तो खुशबू रंग लायी

कोल्ड हुआ तो सिरप ले लिया, सिरदर्द उठा तो टैबलेट खा ली, बैकपेन ने सताया तो ऑइटमेंट लगा लिया। आमतौर पर हेल्थ से जुड़ी परेशानी होने पर हमारा पहला इलाज 'दवा' ही होती है लेकिन क्या आप जानते हैं, जब इन दवाइयों का असर खत्म हो जाता है तो इस परेशानी का 'इलाज' कैसे होता है। आपको जानकर हैरानी होगी लेकिन यह सच है कि परफ्यूम से लेकर साबुन, तेल और बाकी प्रॉडक्ट्स में इस्तेमाल होने वाली खुशबू यानी अरोमा सिर्फ हमारे दिल और दिमाग को सुकून नहीं देता, बल्कि कई बीमारियों में रामबाण का काम भी करता है। सुगंध के जरिए किए गए उपचार को ही अरोमा थेरपी कहते हैं। लौंग से लेकर अजवाइन, यूकेलिप्टिस, मिंट और लैंवेडर जैसे अलग-अलग तेल और उनकी खुशबू के इस्तेमाल से बीमारियों का इलाज करने में डॉक्टरों को कामयाबी मिली है।

कैसे काम करती है अरोमा थेरिपी?
अरोमा का मतलब होता है सुगंध। सुगंध के जरिए इलाज करने को ही अरोमा थेरपी कहा जाता है। आजकल की दौड़ती भागती जिंदगी में लोग टेंशन, अनिद्रा और कॉमन कोल्ड जैसी बीमारियों के शिकार हैं। ऐसे में यह थेरपी बेहद कारगार होती है। जब शरीर पर खुशबू वाले अर्क का इस्तेमाल होता है तो इसका असर ब्रेन और नर्वस सिस्टम पर होता है। इसका इस्तेमाल मसाज और सूंघकर किया जाता है। इसमें मेडिसिनल पेड़-पौधे, जड़, तना, फल-फूल के अर्क का इस्तेमाल किया जाता है। इसे इसेन्शियल ऑइल भी कहते हैं।
कैसे काम करती है अरोमा थेरिपी?
दवा की जगह अरोमा का इस्तेमाल
मुंह और गले के कैंसर से जूझ रहे पेशंट्स जब दांतों के दर्द से जुड़ी कोई शिकायत करते हैं, तब उन्हें ट्रीट करना सबसे बड़ी मुश्किल होती है। दरअसल, कीमोथेरपी की वजह से बॉडी इस कदर प्रभावित होती है कि पेशंट को दवा देने का ख्याल भी नहीं ला सकते। डेंटिस्ट डॉ क्षितिज श्रीवास्तव कहते हैं कि ऐसे पेशंट्स को ट्रीट करने के लिए नैचरल ऑइल या अरोमा थेरपी का सहारा लिया जाता है। दांतों के लिए सबसे ज्यादा मददगार लौंग का तेल है जो न सिर्फ माइल्ड ऐंटीसेप्टिक है, बल्कि पेनकिलर और हल्का सा सुन्न करने का भी काम करता है। इन मरीजों को लौंग के तेल को अलग-अलग मात्रा में दिया जाता है।
दवा की जगह अरोमा का इस्तेमाल
उम्र संग बढ़ती मुसीबत में भी साथ
50 साल की उम्र में मिसेज सक्सेना का अपने घर से बाहर निकलकर सामने बने पार्क तक पहुंच पाना मुश्किल था। अर्थराइटिस का दर्द उन्हें 10 कदम भी नहीं चलने देता था। कुछ लोगों की सलाह मानकर उन्होंने आयुर्वेदिक दवाइयां लेना शुरू किया। 6 महीने तक दवा लेने के बाद भी जब दर्द नहीं सही हुआ तब वह फिजियोथेरपिस्ट के पास आईं। डॉ विवेक कहते हैं कि जब वह हमारे पास आईं तो उनके पैर डक शेप में तब्दील हो चुके थे। उन्हें किसी भी तरह की दवाई देने की गुंजाइश नहीं बची थी। ऐसे में, उनके बेकाबू होते दर्द को यूकेलिप्टिस ऑइल के मसाज और एक्सर्साइज से न सिर्फ कंट्रोल किया बल्कि उसे पूरी तरह से ठीक भी किया गया। 6 महीने तक चले इलाज में वह फिर से बिना किसी सहारे के चलने लगीं हैं।
उम्र संग बढ़ती मुसीबत में भी साथ
रोजमर्रा में हो रहा इस्तेमाल
अरोमा थेरपी को भारत में अलग मेडिकल ब्रांच का दर्जा नहीं मिला है लेकिन यह डॉक्टर्स की पहली पसंद बन गया है और दवा से तंग आ चुके लोगों को राहत भी दे रहा है। यह मानना है अलोपथी के डॉक्टर दीपक श्रीवास्तव का। वह कहते हैं कि अरोमा का इस्तेमाल हमारी डेली लाइफ में हो रहा है, लेकिन हमें इसका पता नहीं चलता। गुलाब जल से लेकर पुदीना, खुशबू और मेडिसिनल इफेक्ट के कारण कई प्रॉडक्ट्स में यूज होता है। डॉ श्रीवास्तव ने बताया कि हाल ही उनके पास एक मरीज आया था, जो कमर दर्द से परेशान था। उसकी दिक्कत इतनी बढ़ गई थी कि वह सीधा खड़ा भी नहीं हो पाता था। कई डॉक्टरों से ट्रीटमेंट लेने के बाद भी उसे कोई फायदा नहीं हुआ था। ऐसे में हमने उसे कच्ची हल्दी के इस्तेमाल की सलाह दी। कच्ची हल्दी में इसेन्शियल ऑइल दूध में पीने के साथ ही कमर में हल्दी लगाई। इसका असर एक हफ्ते में ही दिखने लगा।
रोजमर्रा में हो रहा इस्तेमाल
मूड भी रहता है अच्छा
डॉ अखिला आनंद कहते हैं कि कोई भी दवा हो, उसका साइड इफेक्ट जरूर होता है। हम ठीक होने की चाहत में दवा पर दवा खाते चले जाते हैं लेकिन इसका गलत असर एक समय बाद दिखाई देता है। दरअसल, दवा हमारे इफेक्टेड एरिया के अलावा उस हिस्से पर भी असर करती है, जहां जरूरत नहीं होती। वहीं, अरोमा थेरपी इसके उलट काम करती है। यह सिर्फ वहीं पर असर करती है, जहां जरूरत होती है। यही कारण है कि विदेशों में लोग अरोमा थेरपी की ओर बढ़ रहे हैं। इसका कोई साइड इफेक्ट नहीं होता है। अगर हमारे देश में अरोमा थेरपी को और बढ़ावा मिले तो रिजल्ट और भी बेहतर होंगे। इसका इस्तेमाल कॉमन कोल्ड से लेकर गंभीर बीमारियों तक में किया जाता है। अलग-अलग ऑइल और खुशबू का इस्तेमाल बीमारी का इलाज करने के साथ ही मूड को भी अच्छा करता है। यह निद्रा और टेंशन जैसे समस्याओं में भी बहुत उपयोगी है, जिसके लिए लोग खूब पैसा खर्च करते हैं।
मूड भी रहता है अच्छा

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